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Sunday, September 5, 2010

PEEPLI LIVE - After Thoughts!

इस समय मैं असमंजस में हूँ कि मुझॆ अपने विचार किस भाषा में रखने चाहियें.
मुझे पता है कि अगर मैं English में खुद को express करता हूँ तो वह ज्यादा लोगों तक पहुँचने की गुंजाईश रखता है पर मेरा यह भी मानना है कि मुझे अपने विचार अपनी मातृभाषा में express करने चाहिये क्योंकि आखिरकार ये मेरी मातृभाषा है. पर क्या असल में हिन्दी अब मेरी मातृभाषा बची है? अब तो मैं भी ज्यादातर या तो अंग्रेज़ी बोलता हूँ या Hinglish. मेरे ख्याल से मुझे Hinglish का ही प्रयोग करना चाहिये.पीपली लाइव मैं शुकरवार को ही देखना चाहता था पर उसी दिन Indian ocean का मुंबई में concert होने के कारण मैं फ़िल्म नहीं देख पाया. बहरहाल मैंने फ़िल्म शनिवार रात को चंदन theater में देखी. यहाँ मैं बताना चाहूँगा कि चंदन मुंबई के कुछ ही बचे single screen theaters में हैं. और वहाँ आम जनता के साथ फ़िल्म देखने का मजा ही कुछ और है. मैं वैसे भी multiplex theaters में फ़िल्म देखने के पक्ष में नहीं हूँ क्योंकि वहाँ टिकीट बहुत महंगा होता है और शायद इसीलिये वहाँ फ़िल्म देखते समय आदमी बहुत बड़ा critic हो जाता है. पर चंदन जैसे theater में दर्शक फ़िल्म को इतने कड़क नज़रिये से नहीं देखते हैं और पूरी तरह मगन हो कर फ़िल्म का लुत्फ़ उठाते हैं.

तो खैर मैं अपने एक दोस्त के साथ शनिवार रात फ़िल्म देखने चंदन गया. चंदन में आज भी शनिवार – इतवार के evening और night shows ke टिकीट black में बिकते हैं. और कल भी फ़िल्म houseful थी. इसका श्रेय आमिर खान और उनकी पूरी marketing team को जाता है जिनके शानदार काम के कारण एक निहायत छोटे बजट की, बिना star-cast की film जो एक ग्रामीण आदमी की कहानी है और जिसमे कहने को शायद एक भी regular film masala नहीं है, ऐसी फ़िल्म को houseful opening लगती है औरि इतना शानदार critical response मिला है.

(Contd.After a month)

आज तक यह फ़िल्म ` 35 kकरोड़ का व्यवसाय केवल हिन्दुस्तान में कर चुकी है. इस प्रकार यह इस साल की सफ़लतम फ़िल्मों में एक है. अभी इतवार को ही प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी यह फ़िल्म देखी और इसकी भरपूर सराहना की. मैं यह सब इस लिये बता रहा हूँ क्योंकि मैं भी यह मानता हूँ कि यह एक काबिले-तारीफ़ फ़िल्म है.

मेरे कई मित्रों को यह फ़िल्म बहुत बक़्वास भी लगी है. मेरे अनुसार उनको ऐसा इसलिये लगा क्योंकि शायद वो फ़िल्म की publicity एवं amir khan factor के चलते बहुत ज्यादा उम्मीद ले कर फ़िल्म देखने गये होंगे.

वे शाय3-idiots उम्मीद कर रहे थे जबकि ये फ़िल्म एक सीधी सादी, सरल फ़िल्म है जिसकी 3 idiots से सिर्फ़ एक समानता है और वह है आमिर खान वह भी अभिनेता के रूप में नहीं, मगर निर्माता के रूप में. मगर यह अहम फ़र्क शायद साधारण व्यक्ति को समझ पाना मुश्किल है.

दूसरी वजह शायद है इस फ़िल्म में दिखाई गई सच्चाई जो कि बेहद क्रूर और बेबाक है. जब कभी हम किसी निर्विवाद व कठोर सच्चाई का सामना करते हैं तो या तो हम एक दम सन्न, शांत हो कर स्वीकार कर लेते हैं या फ़िर हम उस सच्चाई को एकदम से खारिज कर देना चाहते हैं क्योंकि उसे स्वीकार करना हमारे बस में नहीं है. पीपली live फ़िल्म ने हमारे इस सच को भ्रम साबित कर दिया कि “AAL ISS WELL”. जिस हिन्दुस्तान को हम आगामी महाश्क्ति मानते हैं उसकी असल स्थिति क्या है? और यकीन मानिये इसे स्वीकार करना उतना ही शर्मनाक है जितना घ्रृणित फ़िल्म के एक दृश्य में इंसानी टट्टी को पर्दे पर देख पाना.

मगर फ़िर भी मेरे लिये यह एक कालजयी फ़िल्म नहीं हैं. इसके कारणों की ही मैं यहाँ चर्चा करना चाहता हूँ.

यह फ़िल्म कभी भी इसके मुख्य पात्र नत्था और उसके परिवार की पीड़ा को ठीक से उकेर

नहीं पायी. या यूँ कहिये कि हम उन पात्रों को केवल उतना ही जान पाये जितना कि फ़िल्म में दिखायी गयी media ने जाना जो कि एक निहायत ही tourist point-of-view है, जिसमें हैरत ज्यादा और समझ कम होती है. इसलिये एक समय के बाद दर्शकों के लिये भी ये पात्र हास्यापद व हैरतमयी हो गये थे. हम कभी उनकी सच्ची पीड़ा को समझ ही नहीं पाये. नत्था के अलावा उस हंगामें में उसके अन्य परिजनों पर; विशेषतः उसकी पत्नी और बच्चों पर क्या बीत रही होगी, हम यह समझ ही नहीं पाये.

वहीं दूसरी तरफ़ हम सामान्य media की रोज़मर्रा की जद्दोजहद, उसका उथलापन, उसका झूठा आवरण आदि, सब ठीक से समझ पाये. य़ही हाल फ़िल्म मे दिखाये गये राजनीतिज्ञ व नौकरशाही पर भी लागू होती है. उनको हम बहुत थोड़े में ही सही मगर पूर्णतः समझ पाये.

क्या इसका कारण यह है कि फ़िल्मकार अनुषा रिज़वी के लिये media, politics और bureaucracy काफ़ी देखीभाली दुनिया है, लेकिन हिन्दुस्तान के गाँव और वहाँ का ग्रामीण जीवन उनके लिये एक दूसरी दुनिया है जिससे उनका वास्ता सिर्फ़ एक सैलानी की तरह है.

अनुषा फ़िल्म में एक बेहद मार्मिक पात्र लायीं होरी महतो.

जो लोग मुंशी प्रेमचंद के किरदारों से वाकिफ़ हैं यह नाम उनको तुरंत उनके कालजयी उपन्यास गोदान की याद दिला देगा. लेकिन जो टीस मुझे गोदान के होरी के लिये होती है वह मुझे फ़िल्म के होरी के लिये नहीं होती. क्योंकि मेरे अनुसार मुझे इस होरी से जुड़ने का पर्याप्त मौका ही नहीं दिया गया. पूरी फ़िल्म में होरी सिर्फ़ ४-५ बार दिखाया जाता है. इससे पहले कि मैं इस पात्र को समझ सकूँ उसकी मृत्यु हो जाती है. उसके बारे में, उसकी जीजिविषा के बारे में हम उसकी मृत्योपरांत जानते हैं, तब वह जानकारी सिर्फ़ ऐसा प्रभाव छोड़ती है जैसा कि किसी अपरिचित की शोक सभा में गलती से पहुँचे हुए व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है. वह सिर्फ़ माहौल की नज़ाकत के अनुसार २ मिनिट का शोक रख लेता है, जबकि वह इस मौत से बिलकुल अप्रभावित है. मेरे अनुसार फ़िल्म में होरी की मौत एक बहुत बड़ा ह्दय-विदारक क्षण था, मगर वह मुझ तक नहीं पहुँचा.


एक चीज जो वर्तमान के नये फ़िल्मकारॊं के साथ देखने में आती है, वह है उन लोगों का फ़िल्मों में गीतों के साथ सौतेला व्यवहार. अब आप इसी फ़िल्म में देखिये. इस फ़िल्म में ४ बेहतरीन गाने हैं- देस मेरा, महंगाई डायन, चोला माटी के राम और ज़िंदगी से डरते हो. ये सभी गाने न सिर्फ़ मधुर हैं, ये बहुत प्रभावकारी गीत भी हैं. हर गीत के शब्द बहुत उम्दा हैं और सुनने वाले को झंझोड़ देते हैं मगर फ़िल्म देखने में यह साबित नहीं होता.
यहाँ मैं मेरी हमेशा की मनपसंद फ़िल्म मदर इंडिया का ज़िक्र करना चाहूँगा जिसके गीत बहुत लोकप्रिय तो थे ही वे फ़िल्म में भी बहुत सश्क्त रूप से पेश भी किये गये थे.

देस मेरा को फ़िर भी फ़िल्म में ठीक तरह से पेश किया गया है, मगर शेष तीनों गाने फ़िल्म में बर्बाद हो गये.

अनुषा जी ने एक समारोह में बताया था कि महंगाई डायन गाना फ़िल्म की पटकथा में कहीं नहीं था, लेकिन जब उन्होंने शूटिंग के दौरान यह गाना सुना तो उन्होंने उसे फ़िल्म में डालने का निर्णय लिया. लेकिन फ़िल्म में उन्होंने पूरा गाना न डाल कर केवल पहला मुखड़ा डाल कर अपना कर्त्तव्य निर्वाह कर लिया. मेरा मानना है कि या तो आप गाना न ही डालते और जब डाला है तो उसका पूरा सदुपयोग करते. जितनी देर के लिये यह गाना पर्दे पर आता है उतनी देर में तो उसका मूड बनता ही है. इससे पहले कि दर्शक उसे आत्मसात करे गाना हट जाता है. इससे मुझे प्रसन्नता कम और खीझ ज्यादा हुई.

चोला माटी की तो और ज़्यादा मट्टी पलित हुई. यह गाना हमे जीवन की क्षण भंगुरता का अहसास कराता है. हमें व्यक्तिगत अहं व भेद-भाव से उपर उठ कर अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देता है. लेकिन फ़िल्म में जिस तरह से इसका उपयोग हुआ है, हम इसके प्रभाव से पूर्णतः अछूते रह जाते हैं. मुझे तो यह भी याद नहीं कि ये गाना फ़िल्म में आता कहाँ हैं. शायद फ़िल्म के अंत में. अगर यही गाना फ़िल्म में तब आता जब कि होरी का मृत शरीर उसके ही द्वारा खोदे गये गड्डे में मिलता है. मैं दावे के साथ कहता हूँ कि यहा गाना दर्शकों की आत्मा तक को झंझोड़ देता था.

और जब तक कि हम चोला माटी के प्रभाव से उबर पाते, ज़िंदगी से डरते हो गाना media, politicians, bureaucrats और साधारण जनों के चेहरों पर आता तो वह बिलकुल सटीक बैठता. मेरा मानना हैं कि उस स्थिति में दर्शक फ़िल्म खत्म होने पर भी नहीं उठते अपितु अपनी कुर्सी पर बैठे सोचते रह जाते. लेकिन यह गाना तो end credits के साथ आया, उस समय जब सभी दर्शक जल्द से जल्द theater से बाहर निकलने में प्रयत्नरत रहते हैं. शायद Indian Ocean Band के सभी फ़िल्मी गानों की नियति end credits ही है. Black Friday में भी उनका सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "बंदे" end credits में ही आया था.

खैर फ़िल्म तो बन भी गयी, रिलीज़ भी हो गयी और super-hitभी हो गयी. हाँ अगर अनुषा सिर्फ़ Art-house film की grammar के साथ थोड़ी commercial film की grammar भी प्रयोग करतीं तो यह फ़िल्म आज की मदर इंडिया हो सकती थी.