Thursday, February 13, 2014

हंसी तो फंसी


इस फिल्म से मेरे फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे के कई सारे साथी जुड़े हुए हैं. फिल्म की एडिटर श्वेता मेरी सहपाठिन हैं, फिल्म के निर्देशक विनिल मैथ्यू मुझसे दो साल सीनियर निर्देशन के छात्र हैं, फिल्म के लेखक हर्षवर्धन कुलकर्णी मुझसे ३ साल सीनियर एडिटिंग के छात्र हैं, फिल्म के साउंड डिज़ाईनर सुभाष साहू मुझसे कुछ ९-१० साल सीनियर साउंड रिकार्डिंग एवं साउंड इंजीनियरिंग के छात्र हैं. फिल्म इंस्टिट्यूट से उत्तीर्ण होने के बाद मैं इन सभी से मुंबई में भी मिलता रहा हूँ. 

मैं यहाँ फिल्म इंस्टिट्यूट का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि कई सालों से फिल्म इंस्टिट्यूट पर एक अभिशाप माना जाता है कि फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे से टेक्नीशियन तो जबर्दस्त निकलते हैं, भले वो सिनेमाटोग्राफी (छायांकन) हो, एडिटिंग (सम्पादन) या साउंड रेकार्डिंग (ध्वनी अंकन) लेकिन वहां से निर्देशक बहुत कम ही सफल होते हैं. और चूँकि विनिल फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे के उन गिने चुने निर्देशन छात्रों में हैं जिन्होंने मुंबई फिल्म उद्योग में सफल पदार्पण किया है इसलिए यहाँ फिल्म इंस्टिट्यूट के अन्य निर्देशन छात्रों का ज़िक्र करना लाज़मी है. 


सबसे पहले तो हमें ये तय करना होगा कि क्या हम सिर्फ उस व्यक्ति को ही सफल फिल्म निर्देशक मानेंगे जिसने मुम्बई फिल्म उद्योग में अपना झंडा गाड़ा है? क्या सिर्फ एक सफल फीचर फिल्म (किसी भी भाषा) में बना लेने से ही कोई सफल निर्देशक होगा? क्या वे लोग जो फीचर फिल्मों के अलावा फिल्मों के अन्य प्रकार जैसे डाक्यूमेंट्री, विज्ञापन फिल्म टेलिविज़न कार्यक्रम आदि बना रहे हैं, वे असफल माने जायेंगे? या ऐसे निर्देशन छात्र जो कि फिल्म बनाना छोड़कर अलहदा कार्य जैसे शिक्षण, लेखन, समाजसेवा या व्यापार कर रहे हैं तो क्या वे असफल हैं? मैं ऐसे कई व्यक्तियों को जानता हूँ और ये भी जानता हूँ कि वे जहां भी हैं बहुत खुश हैं. इन लोगों के बारे में मैं फिर कभी लिखूंगा. अभी तो मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि व्यक्ति कुछ भी करे, अगर वह उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहा है और उसे करते हुये खुश है तो वो मेरी नज़र में सफल है. और यही बात सभी आर्टिस्ट पर लागू है भले वो फिल्मकार हो, अभिनेता हो, पेंटर, मूर्तिकार, संगीतकार इत्यादि. और इसलिए मैं यह मानता हूँ की इस तरह से किसी भी संस्थान के छात्रों में भेद करना, बुद्धिमानी कतई नहीं है.

मैं पुन: फिल्म “हंसी तो फंसी” की रचयिता टीम पर आता हूँ. श्वेता और सुभाष साहू जी के बारे में तो आपको www.imdb.com से और पता चल जायेगा. शायद विनिल और हर्षवर्धन के बारे में न पता चले क्योंकि विनिल अब तक विज्ञापन फिल्मों का निर्देशन कर रहा था और उस क्षेत्र में काफी बड़ा नाम भी है. आपकी जानकारी के लिये कई सारे बड़े प्रसिद्ध विज्ञापन जैसे “केडबरी कुछ मीठा हो जाये”, “तनिष्क ज्वेलरी” और इन सरीखे अन्य विज्ञापनों का निर्देशक है. इसी तरह हर्षवर्धन जो कि फिल्म एडिटर है, वह अभी तक लघु फिल्में और कार्पोरेट फिल्मों का निर्माण-निर्देशन कर रहा था. जहाँ तक मेरी जानकारी है हर्ष द्वारा निर्देशित फीचर फिल्म भी बन के रिलीज़ होने को तैयार है.


अब हम आ जाते हैं फिल्म की सराहना पर. अब तक तो ये जग जाहिर हो चुका है कि फिल्म बहुत पसंद की जा रही है और शायद हिट हो चुकी है. अगर आपने भी ये फिल्म देख ली है तो आप पर भी इसका जादू चल चुका होगा. तो मैं भी फिल्म की तारीफ़ कर समय नहीं गवाउंगा. अलबत्ता मैं तो ये कहूँगा कि जब मैंने फिल्म के ट्रेलर देखे तो मैं ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ. मुझे ये फिल्म करन जौहर केंप से निकली हुई एक और वो पंजाबी परिवारों की कहानी लगी थी और गर आप देखें तो फिल्म के गाने तो अभी भी वही करन जौहर फिल्मों की तरह ही हैं. मुझे विनिल पे बड़ा अचरज हो रहा था कि क्या वो अपनी पहली फिल्म अच्छे से बनाने के चक्कर में अपनी पहचान ही गँवा बैठा है? लेकिन खुदा का शुक्र है कि ये सिर्फ मेरी ग़लतफ़हमी ही थी.

फिल्म की सबसे विशेष बात है उसका लेखन उसमें भी विशेषत: स्क्रीनप्ले. गौर करें कि फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है. एक लड़के की एक लड़की से शादी होने वाली है और शादी से कुछ दिन पहले उसकी जिंदगी में एक और लड़की आ जाती है. दोनों एक दुसरे के प्रति आकर्षित भी होने लगते हैं पर निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि क्या करें. अंत:तोगत्वा ठीक मंडप में लड़का समझ पाता है कि उसका सच्चा जीवनसाथी कौन है और वो मंडप छोड़ के अपने सच्चे जीवनसाथी के पास चला जाता है. दिल है कि मानता नहीं, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, जाने तू या जाने न जी कितनी ही फ़िल्में हैं जो इस समय जेहन में आ रही हैं. ये कहानी कभी पुरानी नहीं होने वाली है और उस पर तब तक फिल्म बनती रहेंगी जब तक मर्द-औरत का रिश्ता है. आप नए समय, नए परिवेश में इसे कैसे कहते हैं वही मायने करता है.
और यहीं हर्ष के लेखन का जादू है. बताइये कौन सी ऐसी फिल्म थी जिसमें इतने दिलचस्प और वास्तविक चरित्र हैं जितने इस फिल्म में हैं. भले वह सिद्धार्थ का मैनेजर है जो तोतला है, उसके माँ -बाप और अन्य रिश्तेदार जो कि यू. पी. लर सम्भ्रांत ब्राह्मण हैं या परिणिति के परिजन हैं जो कि मुंबई भुलेश्वर के गुजराती व्यवसायी हैं. इस सबका बोलचाल, लहजा इतना वास्तविक है कि आप उनसे एकदम से जुड़ जाते हैं. मेरा ख्याल है कि शायद ऋषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की फिल्मों के बाद पहली बार यू. पी. के सम्भ्रांत चरित्रों को फिल्मों में देखा है नहीं तो सब पंजाबी हो गए थे. इसी तरह से कब हमने किसी IPS अधिकारी को सामान्य पिता की तरह देखा है, याद नहीं पड़ता. 

ये सब कहकर मैं विनिल के काम को कमतर नहीं बना रहा हूँ. ऐसा कभी नहीं होता कि लेखक के काम में निर्देशक का बिलकुल योगदान नहीं होता. और फिर जो भी लेखक ने लिखा उसे न्यापुर्वक परदे पे पेश करना निर्देशक का कार्य है. तो अगर ये फिल्म हमें प्रभावित करती है तो नि:संदेह निर्देशक को श्रेय जाता है.

और सोने पे सुहागा हैं वो अभिनेता जो इन सभी किरदारों को निभाने के लिए चुने गए हैं. सबने निष्णात अभिनय किया है. आप किसी में त्रुटी नहीं खोज पायेंगे. दूरदर्शन के समय के अति प्रसिद्ध टी. वी. कार्यक्रम नुक्कड़ के बहुत लोकप्रिय किरदार “खोपड़ी” को निभाने वाले समीर कक्कड़ ने इस फिल्म से पुनरागमन किया है. वे परिणिति के ताउजी बने हैं जो उसे २-३ बार मारते भी हैं.
 
और इन सबने बल दिया है सिद्धार्थ और परिणिति की अद्भुत जोड़ी को. सिद्धार्थ जिनको करन जौहर ने “स्टूडेंट आफ द इयर” फिल्म में पेश किया था, उस फिल्म में ठीक ही लगे थे. मगर इस फिल्म में अपने किरदार की गहराई को बखूबी निभाकर सिद्धार्थ ने स्वयं को लम्बी रेस का घोड़ा साबित कर दिया है.

 
परिणिति को तो कहना ही क्या. वे एक नैसर्गिक अभिनेत्री हैं. उनका अभिनय फिल्म दर फिल्म बेहतर होता जा रहा. अभिनय के अलावा जो बात उन्हें विशेष बनाती है वो है उनका सौंदर्य. वो पूरी तरह भारतीय दिखती हैं. उनके रूप सौन्दर्य में कहीं भी विदेशी छाप नहीं दिखती है. कई लोग ये कह सकते हैं कि वो खुबसुरत नहीं है तो मैं कहूँगा कि यही तो उनका जादू है. वो बिलकुल पड़ोस में रहने वाली लड़की जैसी लगती है, हम उससे एक अजीब सा जुड़ाव महसूस करते हैं. परिणिति की बहन प्रियंका में भी शुरुआत में यही बात थी मगर विदेशियों को प्रभावित करने के चक्कर में कहते हैं कि उसने कई सर्जरी करवा ली जिस कारण अब वो उतनी मोहक नहीं लगती हैं. मुझपे यकीन न हो तो आप प्रियंका का ये विडिओ देख लें.

मेरी परिणिति या उन जैसी तमाम सुंदर युवतियों से सिर्फ यही गुजारिश है कि सौन्दर्य के मापदंड हर देश, हर संस्कृति में अलग अलग हैं. आज के समय में बाजारी अर्थव्यवस्था के दवाब में हम पर अमरीकी सौन्दर्यबोध था जा रहा है जो कि शायद अमरीकियों के लिए ठीक हो पर हिदुस्तानियों के लिये कतई ठीक नहीं है. और ये सिर्फ स्त्रियों पर ही नहीं पुरुषों पे भी थोपा जा रहा है. देख लीजिये आजकल के पुरुष क्या अमिताभ बच्चन / विनोद खन्ना या अनिल कपूर / जैकी श्राफ जैसे दिखते हैं ? ये लोग मर्द दिखते थे, आजकल सब युवक और मर्द के बीच में कहीं दिखते हैं.
 

और ऐसे ही एक शख्स हैं श्री करन जौहर. वो एक सफल फिल्मकार और व्यवसायी हैं और इसके लिए मैं उनका सम्मान करता हूँ. पर मुझे लगता है कि उनके प्रभाव के कारण इस फिल्म का एक महत्तवपूर्ण विभाग उतना जोरदार नहीं बन पाया जितनी की बाकी फिल्म. वह है इसका गीत-संगीत. नहीं तो यू. पी. के ब्राह्मण परिवार की शादी में “Punjabi wedding song” नहीं होता. लेकिन शायद करन जौहर के नाम के कारण ही फिल्म को इतनी अच्छी पब्लिसिटी और रिलीज़ मिली है जिसके लिये उनको साधुवाद.



Tuesday, January 21, 2014

डेढ़ इश्क़िया



मैं शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मुझे “इश्क़िया” फिल्म कोई ख़ास नहीं लगी थी.

हालाँकि उस फिल्म से मेरे FTII  के कुछ सहपाठी जुड़े हुए थे, और उस फिल्म में वर्तमान हिंदी सिनेमा के दो सबसे बेहतरीन किरदार “खालुजान” और “बब्बन” थे, लेकिन फिर भी कोई ख़ास कहानी नहीं बन पायी.
 इन दोनों किरदारों को जो भोपाली भाषा में संवाद दिए गये और जिस तरह से नसीर साहब और अरशद वारसी ने इन किरदारों को निभाया, वही इस फिल्म की लोकप्रियता का मुख्य कारण थे. विद्या बालन और फिल्म के संगीत ने फिल्म को नि:संदेह और बेहतर बनाया था.
इसलिये मैं “डेढ़ इश्क़िया” के लिए कोई ख़ास उत्साहित नहीं था. साथ ही फिल्म का संगीत भी इतना लुभावना नहीं था कि मुझे थियेटर तक आकर्षित करता. लेकिन फिर जब अन्य मित्रों ने इस फिल्म को देख कर इसकी तारीफ़ करना शुरू की, तो मुझे लगा कि फिल्म देख लेनी चाहिये और कल मैंने इस काम को अंजाम दे ही दिया.
फिल्म की कहानी लगभग “इश्क़िया” के समान ही है. खालुजान और बब्बन, दो आशिकमिजाज लेकिन बहुत सीधे, शातिर पर शरीफ चोर हैं. वे दोनों मुश्ताक़ भाई नाम के एक दादा से अपनी जान बचाते फिर रहे हैं क्योंकि उन लोगों से मुश्ताक़ भाई का कुछ बड़ा नुक्सान हो गया था. इस भागा-दौड़ी में उन लोगों की टक्कर बहुत खुबसुरत औरत से होती है और दोनों अपना दिल दे बैठते हैं.



इश्किया में जहाँ दोनों एक ही औरत विद्या बालन के इश्क में पड़ जाते हैं, डेढ़ इश्क़िया में दोनों अलग-अलग औरतें माधुरी दीक्षित और हुमा क़ुरेशी से इश्क़ फरमाने लगते हैं. बस इन दोनों फिल्मों में सिर्फ इतना ही फर्क है. जैसे  इश्क़िया में विद्या बालन दोनों की आशिकी का गलत फायदा उठती है, यहाँ भी माधुरी और हुमा इन दोनों आशिकों के माध्यम से अपना उल्लू सीधा करती हैं और अंत में दोनों केवल हाथ मलते रह जाते हैं.
ये एक काबिलेगौर बात है कि समान कहानी होते हुए भी अगर कहानी की सेटिंग बदल दी जाये तो कैसे पूरी फिल्म नयी लगाने लगाती है. जहाँ इश्क़िया ग्रामीण परिवेश में सेट की गयी थी वहीं डेढ़ इश्क़िया कस्बे में सेट की गयी थी. वहां विद्या एक अनपढ़ ग्रामीण औरत थी तो यहाँ माधुरी उच्च वर्ग की बेहद ज़हीन, तहजीबदार, तमीज़दार औरत है जो कि एक नवाब की बेवा है. बाकी सबकुछ दोनों फिल्मों में अलबत्ता समान है. दोनों नायकों को उनकी नायिकाएं आसानी से न मिल जायें तो विलेन भी हैं, मुश्ताक़ भाई भी और कई सारे मनोरंजक सहायक किरदार भी.
और शायद इसीलिए ये फिल्म बांधे रखती है. 


अगर आप पटकथा पर गौर करेंगे तो उसमें कई त्रुटियाँ हैं, लेकिन सभी अभिनेताओं के सधे हुए अभिनय, बेहतर गढ़े हुए पात्र, ज़मीनी मगर उम्दा संवाद के कारण फिल्म की पकड़ रहती है. लेकिन शायद यही वजह है कि ये फिल्में कभी मुन्नाभाई सीरिज़ जैसी फिल्में नहीं बन सकती हैं नहीं तो देखिये दोनों में कितनी समानता है. दोनों फिल्मों में दो किरदार हैं जो अलग अलग रोमांचक परिस्थितियों में जा कर अपना लक्ष्य पाने के लिए मुश्किलों से उलझाते हैं और अंत में  अपनी मंजिल पाते हैं. लेकिन अपने बेहतरीन स्क्रीनप्ले के कारण जहाँ मुन्नाभाई की फ़िल्में हैं, इश्किया उसके आस पास भी नहीं है. 


डेढ़ इश्क़िया एक ऐसी यात्रा है जो जब तक चलती रहती है यात्री को मजा आता रहता है लेकिन जब यात्रा ख़त्म हो जाती है तो वह सोचता है कि ये मैं कहाँ आ पहुंचा? खैर यह भी अपने तरह का सिनेमा है और मैं इसके विरुद्ध नहीं हूँ.

डेढ़ इश्क़िया एक टाईम पास मनोरंजन है. लेकिन इस फिल्म को मैं एक बहुत बड़े कार्य के लिये धन्यवाद देना चाहता हूँ. इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों में भाषा के जादू को पुन: स्थापित किया है. ज़मीनी पात्र और उनके द्वारा बोली गये ज़मीनी भाषा, जैसाकि इस फिल्म में दो भोपाली चोर जिस भोपाली हिंदी में बात करते हैं, दर्शकों को बहुत पसंद आते हैं. ज़रूरत है केवल अच्छे किरदारों को रोचक परिवेश में गढ़ने की. साथ साथ इस फिल्म में मुशायरा जैसी लुप्त होती संस्कृति को पुन: दर्शकों के सामने परोसा है. शेरो शायरी से बात कितनी गाढ़ी हो सकती है, ये इस फिल्म से आभास हो जाता है.

संवाद, अभिनय के अलावा कैमरावर्क, ड्रेस डिज़ाइन, आर्ट डाइरेक्शन आदि भी शानदार है. अगर इसका संगीत भी इश्क़िया जैसा होता तो बात कुछ और ही हो जाती. लेकिन फिर भी कुल मिला कर एक बार देखे जाने लायक फिल्म है.


Tuesday, December 3, 2013

सिंघ साहब द ग्रेट "Failure"



कुछ दिनों पहले मैंने “सिंघ साहब द ग्रेट” फिल्म देखी. मैं यहाँ बताना चाहूँगा कि मैं निर्देशक अनिल शर्मा का प्रशंसक हूँ. उन्होंने कई अच्छी फिल्में बनायी हैं जैसे कि श्रद्धांजलि, हुकुमत, अपने और ग़दर. साथ साथ मैं सन्नी देओल का भी प्रशंसक हूँ.





  

तो जब इस फिल्म में इन दोनों कलाकारों ने पुन: साथ काम किया तो मेरा देखना तो लाजमी ही था.

फिल्म की कहानी है एक ईमानदार कलेक्टर की जो अपना कर्तव्य निभाते हुये खलनायक के हाथों अपनी पत्नी खो देता है. साथ साथ खलनायक उस पर एवं उसके सहयोगी ५ पुलिस अफसरों पर रिश्वत लेने का आरोप लगा कर उनको १६ साल की जेल करवा देता है. कलेक्टर साहब को अच्छे चाल चलन के कारण राज्यपाल ७ साल बाद ही रिहा कर दिया जाता है. अपने जेलर मित्र की प्रेरणा से और अपनी स्वर्गीय पत्नी की इच्छानुसार कलेक्टर साहब बदला लेने के बजाय बदलाव के रस्ते पर चल पड़ते हैं लेकिन छद्म नाम “सिंघ साहब” के साथ अपने आपको सरदार बना कर. उनके द्वारा किये जा रहे समाज कल्याण के कारण बहुत विख्यात हो चुके हैं और उनको खलनायक के शहर में भी बदलाव के लिये निमंत्रित किया जाता है. इस कारण उनका पुन: खलनायक से टकराव होता है. काफी खून खराबे के बाद सिंघ साहब की महानता से खलनायक का ह्रदय परिवर्तन हो जाता है और वो अपने गुनाह कुबूल कर लेता है. इस से सिंघ साहब से बाकी ५ साथियों को भी रिहा कर दिया जाता है. साथ ही वो अपनी ज़्यादातर दौलत समाज कल्याण कार्यों हेतु दान कर देता है. और सिंघ साहब अपने बदलाव के रास्ते पर आगे निकल पड़ते हैं.

इस कहानी ने मुझे इतना उत्सुक बना दिया कि बता नहीं सकता. सन्नी देओल जो अपने ढाई किलो के हाथ के लिए जाने जाते हैं, वो ये गांधीवादी सिंघ साहब बन कर कैसे लगेंगे ? फिल्म के ट्रेलर में तो खूब खून खराबा दिखाया जा रहा है पर कहानी कुछ और कह रही है. और बस यहीं ये फिल्म मुंह के बल गिर गयी. अरे जब आप सन्नी देओल की ही-मेन छवि को ही भुनाना चाहते हैं तो फिर उस पर ये गांधी और विवेकानंद का पर्दा क्यों ? जब आपको एक्शन दिखाना है और हमको भी तालियों और सीटियों के साथ उसे ग्रहण करना है तो फिर शर्म कैसी?


 मगर कुछ हट कर करने की कोशिश में फिल्म के हालत ऐसी हो गयी जैसे “भानमती का कुनबा”. जानकारी हेतु बतला दूँ कि कहावत है “ भानमती ने कुनबा जोड़ा, कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा.”



मुझे डेविड धवन जी ने एक बात सिखाई है जो उन्होंने स्वयं हिंदी सिनेमा के कालजयी निर्देशक मनमोहन देसाई जी के किसी इंटरव्यू में पढ़ी थी. “एक बार आपने फिल्म में जो सुर लगा दिया, पूरी फिल्म उसी सुर में ख़त्म करनी पड़ेगी. अगर फिल्म के बीच आप अपना सुर बदलोगे तो पिट जाओगे.” 
मतलब यह कि अगर आप एक बार अपने सुधि दर्शकों को कल्पना लोक में ले गए हो जहाँ के नियम कायदे आपके अपने बनाए हुये हैं तो फिर उसी सैर में आप उनको दूसरे लोक में नहीं ले जा सकते. दर्शक स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं और आप को रिजेक्ट कर देते है.


आप खुद ही इस कथन की सच्चाई परख सकते हैं. यह हर कालजयी, अच्छी फिल्म / कहानी पर लागू होता है. अभी पिछले सप्ताह रिलीज़ हुई “गोलियों की रासलीला : राम लीला” इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. 

दर्शक आपकी कल्पना से असहमत हो सकते हैं पर वो उसको खराब नहीं बोल सकते है. इस फिल्म को जो बुराइयाँ मिल रही हैं वो इसलिए कि आजकल हम लोग असहमति पर सहमत होना भूल गए है. तो जब भी कोई किसी से असहमत होता है तो वो उसे पूरी तरह नक़ार देता है जो की समाज के विकास के प्रतिकूल है.

खैर वापस सिंघ साहब पर आते हैं. जैसा कि मैंने ऊपर लिखा सर्वप्रथम तो कहानी में ही काफी कान्फ्लिक्ट है. फिर पटकथा और डायलाग पर भी कोई विशेष मेहनत नहीं की गयी. कुछैक गाने जो की आइटम नंबर हैं ठीक हैं मसलन “कल से दारु बंद” और “कत्था लगा के”.

अन्य कास्टिंग में अच्छे अच्छे कलाकार जैसे यशपाल शर्मा, मनोज पाहवा, जानी लीवर आदि कमजोर पटकथा के कारण कुछ भी नहीं कर पाये हैं. सन्नी देओल की पत्नी के रूप में नयी कलाकारा उर्वशी रौतेला हैं जो कि काफी सुन्दर और आत्मविश्वास से भरी लगीं लेकिन उनकी और सन्नी की जोड़ी बेमेल ही दिखी. उम्र का फर्क सम्भालने के लिए २-३ बार सन्नी से कहलवाया गया है कि चाचा बोला था कि उम्र का फर्क ज्यादा है, मत कर शादी.

कुल मिला कर फिल्म में मजा नहीं आया. लेकिन फिर भी इसके जमीन से जुड़े होने के कारण और सन्नी देओल – अनिल शर्मा के साथ होने के कारण फिल्म के प्रति एक उत्साह है जो कि सप्ताहांत के बाद ख़त्म हो जायेगा. अगर फिल्म देख भी लें तब भी सिंघ साहब ग्रेट नही बनेंगे.

Thursday, November 21, 2013

गोलियों की रासलीला "राम-लीला" : मेरी प्रतिक्रिया


कल शाम मैंने यहाँ पुणे स्थित नवनिर्मित सिनेपोलिस मेगाप्लेक्स में  “गोलियों की रासलीला – राम लीला” फिल्म देखी. गौर करें की यह मेगाप्लेक्स है जहाँ १२ विशालकाय स्क्रीन हैं और एक दिन में तक़रीबन ९० फिल्म शो दिखाए जाते हैं. इन १२ में से कम से कम ६ स्क्रीनों पर “राम लीला” फिल्म ही प्रदर्शित की जा रही है. सोमवार शाम को एक ही जगह इतने शो होने के बावजूद हर शो फुल जा रहा है. सिर्फ इसी बात से यह साबित हो जाता है की संजय लीला भंसाली की फिल्म को नज़रअंदाज नहीं किया जाता है.

खैर यहाँ तक तो हम सभी एकमत होंगे. अब आती है फिल्म देखने के बाद मेरी प्रतिक्रिया की. सच कहूँ तो मैंने काफी अरसे बाद एक ऐसी हिंदी फिल्म देखी है जिसके हर गाने पर मैं तालियाँ बजाते हुये (क्योंकि मैं सीटी नहीं बजा पता हूँ) भाव विभोर था, कई सारे डायलाग पर “क्या बात” कहते  हुये सराहना की है, कई जगह पर अलग अलग अभिनेताओं की (विशेषत: रणवीर, दीपिका और सुप्रिया पाठक) से मुग्ध हुआ, एवं इस तरह के असंख्य पहलुओं ने फिल्म मेरे लिए बहुत ही जोरदार बना दी है. यह तय है की मैं यह फिल्म कुछैक बार पुन: देखूंगा.

कई सारे दर्शकों एवं समीक्षकों को फिल्म बहुत लाउड, बहुत अतिश्योक्त लगी. ऐसा भी मानना है की पटकथा, संवाद एवं चारित्र और बेहतर हो सकते थे. मैं इनसे पूर्णत: सहमत हूँ लेकिन मैं यह नहीं मानता की इससे यह फिल्म खराब हो गयी.

सबसे पहले बात करें फिल्म के लाउड और अतिश्योक्त होने की. तो मुझे बतायें कि संजय भंसाली की पहले फिल्म "ख़ामोशी" के अलावा कौन से फिल्म लाउड और अतिश्योक्त नहीं थी. ये उनका सिनेमा है और वो इसी के लिये जाने जाते हैं. उनके सिनेमा का सौंदर्य ही उसके अतिश्योक्त होने में है. और फिर हमारा पूरा भारतीय समाज और संस्कृति भी तो ऐसी ही है. अगर आपको इस फिल्म का अतिश्योक्त होने पर ऐतराज है तो माफ़ कीजिये फिर आपको भारतीय संस्कृति से ही ऐतराज़ है.

 मेरा मानना है की पश्चिमी साहित्य, फ़िल्मों इत्यादि से आजकल हम इतना ज्यादा रूबरू होते हैं कि हमें वही अपना लगने लगता है. इसमें कोई बुराई नहीं है. मेरा तो सिर्फ इतना निवेदन है कि ऐसे लोगों की शिकायत वाजिब तब है जब कि वे पहली बार संजय भंसाली की फिल्म देख रहे हैं. चलिए मान लिया कि आप इस तरह के सिनेमा से परिचित नहीं हैं. लेकिन जो लोग संजय भंसाली के सिनेमा से वाकिफ होते हुये इस फिल्म से ऐसी शिकायत कर रहे हैं वे ऐसे लग रहे हैं जैसे शक्कर की मिठास की शिकायत कर रहे हैं.
                   
अब आती है बात पटकथा, संवाद एवं चारित्र और बेहतर हो सकते थे. बिलकुल हो सकते थे और फिल्मकार ने अपनी सूझबुझ के हिसाब से इनको सर्वश्रेष्ठ ही किया है. मुझे भी लगा कि मध्यांतर के बाद पटकथा उलझ गयी है और पात्र थोड़े कन्फ्यूज़ हो गए हैं. मगर इसके बावजूद फिल्म के पकड कम नहीं हुई जिसका श्रेय फिल्मकार को जाता है. राम के चारित्र में विरोधाभास (contradiction) है. एक तरफ तो वह अहिंसावादी है, स्त्रियों की इज्जत करता है, वहीँ दूसरी ओर वह अपने भाई की फ़िज़ूल की गोलोबारी की नुमाईश पर खुश हो रहा है, औरतखोर है. तो भाई मेरे, ऐसे विरोधाभास से ही तो मनुष्य बनता है. अगर विरोधाभास नहीं होते तो वो परवर दिगार नहीं बन जाता.

कई लोगों को संवाद अश्लील लगे होंगे. यहाँ तक राम और लीला की बेबाक़ चिपटा चिपटी भी कइयों को नागवार हो सकती है. मैं उन लोगों के असहमति से सहमत हूँ पर पुन: कहूँगा कि  इससे यह फिल्म खराब नहीं हो जाती. मैं यह उत्तर नहीं दे सकता की संजय भंसाली ने ऐसा क्यों चुना पर यह बता सकता हूँ कि यह मुझे क्यों अच्छा लगा. फिल्म का परिवेश ग्रामीण है जहाँ ऐसी बेबकता सामान्य है. और फिर आजकल के युवा बातचीत में १० साल पहले के युवाओं जैसे बात नहीं करते हैं. अब केवल लड़के आपस में गाली का प्रयोग नहीं करते बल्कि अब लड़के लड़की दोनों आपस में ऎसी ही बेबाक बातें करते हैं. एक स्तर पर ये अच्छा भी है क्योंकि अब लिंगभेद कम होता जा रहा है. जहाँ तक राम-लीला के कामुक होने की बात है, वे दोनों ही युवा और काफी बिंदास दिखाए गये हैं. और फिर दोनों जिस सुर में अपनी मित्रता की शुरुआत करते हैं पूरे समय उन्होंने वही सुर कायम रखा है. फिर सेक्स क्या प्रेम का हिस्सा नहीं है? तो फिर उन दोनों के बेबाक सेक्सुअलटी के प्रदर्शन में क्या खराबी है?


मुझे तो यह समझ नहीं आता कि जब अनुराग कश्यप “गैंग्स आफ वासीपुर” में मनोज बाजपई और नवाज़ुद्दीन से ऐसी कामुक हरक़त करवाते हैं तो यही समीक्षक उसे अतिश्योकिति से सराहते हैं. ऐसा दोहरापन क्यों ?



याद कीजिये आपने कब एक-एक कलाकार को इतने गरिमामय सौन्दर्य, वेशभूषा, मेकअप वगैरह के साथ पिछली बार देखा था? कब आपने इतनी बारीकियों के साथ बना हुआ सेट देखा था, कब आपने इतने डिटेल के साथ एक काल्पनिक जीवन देखा था? कब इतना मधुर संगीत, बेकग्राउंड संगीत के साथ सुना है? कब मुख्य कलाकारों के साथ सहयोगी कलाकारों ने भी इतना जानदार अभिनय किया है?

और सबसे ऊपर कब एक फिल्मकार ने अपनी कल्पना से बिना कोई समझोता किये, बाक्स आफिस पर उसके परिणाम की चिंता किये बगैर फिल्म बनायी है? वह भी तब जबकि उसकी पिछली २ फ़िल्में फ्लाप थीं. 

वर्तमान हिंदी फिल्मों में तो ऐसा कम ही देखने को मिलता है. क्या करन जौहर, रोहित शेट्टी, यशराज बैनर आदि आज ऐसा सिनेमा दे पा रहे हैं?

गौरतलब है कि कुछ समय पहले यशराज बैनर की “इशक़ज़ादे” आयी थी. वो भी शेक्सपियर के “रोमियो – जुलिएट” नाटक पर आधारित थी. मुझे उस फिल्म से सिर्फ परिणति चोपड़ा का अभिनय याद है और कुछ भी नहीं. देखिये रोमियो – जुलिएट जैसी कालजयी कहानियों के नित नए नए adaptation (अनुरूपण) होते रहेंगे. पर इसका मतलब यह नहीं की हम उस नये काम की उसी पुराने क्लासिक के साथ तुलना करते रहें. हर नाटककार, फ़िल्मकार किसी भी क्लासिक को अपने अनुसार निरुपित करता है और करेगा भी. हम लोग महज उसके परिणाम से सहमत / असहमत हो सकते है और कुछ नहीं.

हाँ अंत में मैं सिर्फ यह और कहना चाहूँगा कि टेक्नालाजी के आसान हो जाने से अब हर कोई हर विषय पर स्वयं को एक्क्स्पर्ट बताने लगा है. ये तथाकथित विशेषज्ञ विशेषत: किसी बड़े व्यक्ति / कार्य की आलोचना करने में असीम आनंद पाते हैं. इस परनिंदा में वे यह भूल जाते हैं की वे मुद्दे से ही भटक चुके है. वैसे भी कहते हैं कला की आलोचना नहीं सराहना होनी चाहिये.

Monday, September 20, 2010

हिन्दी सिनेमा - वर्तमान परिदृश्य - भाग १



वैसे तो आप लोगे मेरे बारे में जानते ही हैं कि मैं मुंबई में हिन्दी फ़िल्म उद्योग में बतौर editor काम कर रहा हूँ. Editing के अलावा मुझे फ़िल्मों के व्यवसायिक पहलू के बारे में जानने की काफ़ी उत्सुकता है. इसलिये मैंने कुछैक फ़िल्में बतौर Executive Producer या Associate Director भी की हैं. फ़िर पिछ्ला १ साल मंदी के चलते मैंने अपने मित्र साईं कबीर के साथ बतौर Associate writer भी कार्य किया है. जिन फ़िल्मों से मैं जुड़ पाया वो हैं - ह्ल्ला, Leaving Home- Life and music of Indian Ocean और सोच लो. इसके अलावा २-१ फ़िल्में अभी निर्माणाधीन हैं. उनके बारे में फ़िर कभी. इन सब अनुभवों के चलते मुझे थोड़ा बहुत ज्ञान हुआ है कि आज के हिन्दी फ़िल्म उद्योग की हक़ीक़त क्या है.

यह सामान्य जानकारी है कि हर साल हमारे यहाँ निर्मित ४०० करीब हिन्दी फ़िल्मों में से मुश्किल से ५% यानि २०-२५ फ़िल्में ही हिट हो पाती हैं या यूँ कहा जाये कि घाटे का सौदा नहीं होतीं हैं. फ़िर भी हर साल निर्मित होने वाली फ़िल्मों की संख्या बढ़ती जा रही है. ऐसा क्यों ?

निरंतर घाटा होते हुये भी यह व्यापार हर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है. आखिर इसके पीछे कौन सा Economics है ?

जी हाँ फ़िल्में एक सृजनात्मक कार्य होने के बावज़ूद, इसमें लगने वाले अधिक संख्या के धन के कारण इस क्षेत्र में commerce और economics का भी दखल है.

हिन्दी फ़िल्मों को जो झटका TV और internet के आगमन से लगा है, वह अभी तक उससे उबर नहीं पायी है. आप लोगों ने कभी न कभी किसी पुरानी फ़िल्म जैसे की "छोटी सी बात, रजनीगंधा, सावन को आने दो" आदि को देखते हुये सोचा होगा कि आज ऐसी फ़िल्में क्यों नहीं बनती हैं.


इसका एक कारण TV का आगमन है, जिसने लोगों को घर बैठे ही फ़िल्में उपलब्ध करा दी हैं.

मगर फ़िर आप कहेंगे कि TV के आगमन तो सारी दुनिया में हुआ है. फ़िर इससे Hollywood और दक्षिण भारतीय फ़िल्में क्यों नहीं प्रभावित हुईं ?

इसका उत्तर है इन फ़िल्म उद्योगों की व्यापक पहुँच. आप देखते ही होंगे कि कैसे हर साल Hollywood अपनी पहुँच दुनिया के हर कोने तक बढ़ाता ही जा रहा है. उसी प्रकार दक्षिण भारतीय़ सिनेमा में तेलुगु और तमिल सिनेमा भी निरंतर अपनी पहुँच बढ़ाता ही जा रहा है. वे निरंतर नय़ी technology का उपयोग कर, नये-नये theater का निर्माण कर, अधिक से अधिक भाषाओं में अपनी फ़िल्म dub कर उसे अधिकतम लोगों तक पहुँचा रहे हैं.


आज भी पूरे हिन्दुस्तान के ५०% से भी अधिक film theaters दक्षिण भारत के केवल ४ प्रदेशों में है. और शेष भारत के मुक़ाबले वहाँ आज भी अधिक film theaters का निर्माण हो रहा है. क्या आपको पता है कि इन ४ दक्षिण भारतीय प्रदेशों में आज भी किसी भी film theater में सर्वाधिक ticket price केवल ` 100/- है. वहाँ पर ticket price इससे ज्यादा रखना गैर कानूनी है. इतना ही नहीं दक्षिण भारतीय सिनेमा की pirated copy मिलना लगभग असंभव है. क्योंकि प्रथमत: तो वहाँ piracy करते हुये पकड़े जाने पर ३ महीने की सज़ा का प्रावधान है. यह वहाँ non-bailable offense है.
दूसरा कारण वहाँ के fans group का सक्रिय होना है. यह fan clubs सीधे ही अपने चहेते फ़िल्म सितारे व उसके फ़िल्म निर्माता के संपर्क में होते हैं. कहीं भी अगर उनको कहीं से भी जरा सी भनक पड़ जाती है कि उनके क्षेत्र में कोई उनके चहेते फ़िल्मकार की फ़िल्म की piracy कर रहा है, तो वे तुरंत वहाँ धावा बोलकर सभी pirated copies नष्ट तो करते ही हैं, साथ साथ वे उस व्यापारी को मुँह काला कर पुलिस में भी दे देते हैं.

इसी व्यवस्था के कारण वहाँ ` 175 करोड़ की रजनीकांत अभिनीत फ़िल्म "रोबोट" बन सकती है. और मैं आपको बता दूँ कि सारे trade pundits अभी से ही यह घोषणा कर रहे हैं कि यह फ़िल्म आज तक की सबसे बड़ी super duper hit होने वाली है.



जहाँ वे स्वयं की मौलिक कहानी कहने पर ज़ोर दे रहे हैं, जहाँ वे अपनी फ़िल्मॊं के लिये बड़े से बड़ा बजट रख रहे है और नये-नये प्रयोग कर रहे हैं, वहीं अफ़सोस हिन्दी सिनेमा में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. ऐसा क्यों ?

आखिर जो सिनेमा देश में सबसे बड़ा है, वही सबसे पिछ्ड़ा क्यों है ? उसी में सबसे कम मौलिक कार्य किया जा रहा है, उसी में सबसे ज़्यादा फ़िल्में flop हो रही हैं. आखिर ऐसा क्यों ?

इन सबका जवाब जानने के लिये हमको थोड़ा अतीत में जाना होगा. ७० की सदी में जब हिन्दी सिनेमा की लोकप्रियता सबसे ज्यादा थी, तब के हिन्दी फ़िल्मकारों ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान लिया और सभी इस मुग़ालते में जीने लग गये कि we are the best, nobody can beat us. बस जब आप किसी भी क्षेत्र में स्वयं को खुदा समझने लगेंगे तभी से आपका पतन शुरू हो जायेगा.

तब हिन्दी फ़िल्मकारों ने मान लिया कि हम तो इतने बड़े हो चुके हैं कि अब जनता हमारे पास स्वय़ं आयेगी हम क्यों जनता के पास जायें. इसलिये ८० के दशक में आप पायेंगे कि अचानक से नये theater बनना बंद हो गये, जो थे वे भी इस तरह चलाये जाने लगे कि जैसे हम दर्शकों पर कोई एहसान कर रहे हैं. उन theaters रख-रखाव व व्यवस्थापन के स्तर में अचानक कमी आ गयी जिसके कारण आम जनता को बेहद दुख हुआ. बड़े बड़े शहरों के सर्वश्रेष्ठ theaters की दशा ये होने लगी थी कि वहाँ लोग परिवार समेत जाने में हिचकने लगे थे. इसलिये उन लोगों ने TV को मजबूरी में सिनेमा का पर्याय स्वीकार कर लिया.

इसका अपवाद शायद मुंबई के theaters थे जो कि सन २००० तक अपनी शानो शौकत बरकरार रखे हुये थे. पर उनमें से भी ज़्यादातर या तो अब बंद हो गये हैं या फ़िर उनको multiplex में परिवर्तित कर जा चुका है. यह निर्विवाद सच है कि सन ८० से २००० तक हिन्दी भाषी शहरों में फ़िल्म theaters की संख्या में कमी आयी थी.

इसके साथ ही उस दशक में बनने वाली फ़िल्में भी शायद उपरोक्त दंभी फ़िल्मकार ही बना रहे होंगे और उसका असर हम सबने देखा है. मुझे आज भी याद है सुभाष घई ने जब "यादें" फ़िल्म का मुहूर्त लंदन में किया था तो उन्होंने कहा था कि "मैं फ़िल्म NRI audience के लिये बनाना चाहता हूँ क्योंकि ये मुझे डालर और पाउन्ड में पैसा देते हैं. वहीं यू. पी., बिहार के दर्शक चंद रूपयों में फ़िल्म देखते हैं. तो मैं इनके लिये फ़िल्म क्यों बनाऊँ. ?". यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि तब से घई साहब जो कि एक समय showman माने जाते थे वे अब एक hit फ़िल्म के लिये तरस रहे हैं.



सन १९८८ में सिर्फ़ २ फ़िल्म hit हुई थीं "क़यामत से क़यामत तक और तेजाब”. शेष सारी फ़िल्मों का सूपड़ा साफ़ हो गया था. यह दौर भी सन ९५-९६ तक चला "जब हम आपके कौन" ने सफ़लता के अप्रतिम झंडे गाड़ कर दर्शकों को वापिस theater में खींचा. पर तब तक अधिकांश theater या तो दम तोड़ चुके थे या मृत्युशैय्या पर थे.



इस तरह एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि सिनेमाघरॊं की कमी के कारण फ़िल्मों की माँग में बेहद कमी आ गयी जबकि उसकी उत्पादन संख्या निरंतर बढ़ती रही. इसके चलते जो छोटी फ़िल्में बनीं वे सिनेमाघर तक कभी पहुँच ही नहीं पायीं. वे या तो डब्बाबंद हो गयीं या फ़िर जैसे तैसे TV व VDO के जरिये अपने दर्शकों तक पहुँची. इस में कई बेहतरीन, मौलिक किंतु छोटे बजट की फ़िल्मॆं - YMI, आमरस, मिथ्या आदि, कुर्बान हो गयीं.


तब हिन्दी फ़िल्म उद्यॊग ने इस समस्या का अद्भुत हल निकाला - Multiplex. उन्होंने सरकार से सिनेमा को प्रोत्साहन के नाम पर tax holiday ले कर आलीशान mall cum multiplex खड़े कर डाले. जहाँ पहले एक सिनेमाघर होता था, वहाँ अब ४-५ सिनेमाघर हो गये. इस तरह ज़्यादा उत्पन्न हो रहीं फ़िल्मों के लिये ज्यादा सिनेमाघर बन गये.

मगर क्या ये multiplexes खोये हुय़े दर्शकों को वापिस ला सके? जवाब सिर्फ़ एक है - नहीं !

Multiplexes ने निःसंदेह ज्यादा screens मुहय्या करवा दीं पर टिकीट खरीदकर फ़िल्म देखने वालों की संख्या कम कर दीं. मैं अपने जैसे कई फ़िल्म प्रेमियों को जानता हूँ जो single screen theater में लगने वाली हर फ़िल्म देखते थे और हम ऐसा इसलिये कर पाते थे क्योंकि फ़िल्म के टिकीट के भाव हर व्यक्ति की जेब के अनुसार होते थे. ` १० से लेकर ` ६० तक कम से कम ३ दरजे होते थे. मगर multiplexes में अधिकतर टिकीट का मूल्य ` १५० से ` २५० तक होता है. और पहले weekend पर तो यह मूल्य ` २०० से ` ३५० तक हो जाता है. आज मैं एक भी ऐसे फ़िल्म-प्रेमी को नहीं जानता हूँ जो कि इन multiplexes में जाकर हर फ़िल्म देखते हैं. कुछैक हैं जो कि सारी तो नहीं पर सप्ताह की एक फ़िल्म ज़रूर देखते हैं. मगर इन लोगों की संख्या उगलियों पर गिनी जा सकती है.

मैं दावे के साथ कहता हूँ कि अगर सभी multiplex अपने हर hall में आगे की 3 rows को सिर्फ़ ` ५० प्रति सीट करें तो ये सभी seats हमेशा full रहेंगी और multiplexes को houseful की जगह rowful का बोर्ड तो अवश्य लगाना पड़ेगा.

Multiplexes का एक और दुष्प्र्भाव जो हुआ वह है सिनेमा देखने की सामूहिक, लोकतांत्रिक (democratic, communal) भावना का क्षरण (loss).

जहाँ single screen theater में विभिन्न आय वाले लोग अलग - अलग दरजे में ही सही, कम से कम एक साथ फ़िल्म देखते थे, वहीं multiplexes में सिर्फ़ एक जैसी आय व हैसियत वाले व्यक्ति ही फ़िल्म देखते हैं. यह हक़ीक़त cinema की democratic spirit के बिलकुल खिलाफ़ है.


एक और चीज़ जो हिन्दी सिनेमा के पतन के लिये जिम्मेवार है वह है satellite TV का प्रसार. जहाँ पहले किसी भी कस्बे, गाँव में जब भी फ़िल्म पहुँचती थी उसको बिलकुल नई फ़िल्म की तरक लोग तत्परता से देखते थे. वहीं अब satellite TV पर फ़िल्म के promos और trailers की निरंतर उपलब्धता से हर गाँव, हर कस्बे में यह पता रहता है कि यह फ़िल्म कब रिलीज़ होने वाली है. और सभी सामान्य जनता के जैसे इन गाँव, कस्बों में भी लोग फ़िल्म पहले दिन ही देख लेना चाहते हैं. और जब उनको वह फ़िल्म अपने पास के सिनेमाघर (जो कि नदारद है) में नहीं मिलती तो वे piracy copy खरीद कर अपनी कुतुहूल शांत करते हैं.


तो भाई साहब हिन्दी भाषी दर्शक के लिये या तो फ़िल्म उनकी पहुँच से बाहर है या फ़िर उनकी जेब से बाहर है.

तो ऐसी परिस्थिति में कोई भी व्यक्ति क्या करेगा ?

चोरी... जी हाँ चोरी.


इसके अलावा क्यों Hindi cinema quality के स्तर पर गिर रहा है, इसके चर्चा हम अगली post में करेंगे.